ACME ACADEMYWEEKLY EVALUATION TESTSubject: Hindi Literature
Time Limit: 30 Mins
Max Marks: 30 Marks
|
|
Student Name:
Roll Number:
Class / Sec:
Date:
GENERAL INSTRUCTIONS:
1.
कवि अपनी आत्मकथा कहने में संकोच क्यों करता है?
[1 Mark]
2.
कवि के अनुसार लोग उसकी आत्मकथा सुनकर क्या अनुभव करेंगे?
[1 Mark]
3.
कवि क्यों कहता है कि लोग उसकी कथा सुनकर अपनी गागर भर सकते हैं?
[1 Mark]
4.
कविता में कवि के व्यक्तित्व की कौन-सी विशेषता दिखाई देती है?
[1 Mark]
5.
कवि अपनी कथा कहने के बजाय क्या करना उचित समझता है?
[1 Mark]
6.
“छोटे से जीवन की कैसे बड़ी कथाएँ आज कहूँ” से क्या संकेत मिलता है?
[1 Mark]
7.
कविता में “मधुप” किसका प्रतीक है?
[1 Mark]
8.
“मुरझाकर गिर रही पत्तियाँ” किसका प्रतीक है?
[1 Mark]
9.
“अनंत नीलिमा” से क्या अभिप्राय है?
[1 Mark]
10.
“गागर रीती” का क्या अर्थ है?
[1 Mark]
11.
कवि किस प्रकार की गाथा गाने से हिचकता है?
[1 Mark]
12.
“स्मृति पाथेय” का क्या अर्थ है?
[1 Mark]
13.
कथन: कवि अपनी आत्मकथा सुनाने में संकोच करता है। कारण: उसका जीवन सामान्य है।
[1 Mark]
14.
कथन: कवि कहता है कि लोग उसकी कथा सुनकर सुख पाएँगे। कारण: लोग उसमें अपने जीवन की झलक देखेंगे।
[1 Mark]
15.
कथन: कवि अपने जीवन को छोटा बताता है। कारण: उसके जीवन में विशेष घटनाएँ नहीं हैं।
[1 Mark]
16.
कथन: कवि उज्ज्वल गाथा गाने से बचता है। कारण: उसका जीवन साधारण अनुभवों से भरा है।
[1 Mark]
17.
कथन: स्मृतियाँ कवि के लिए पाथेय हैं। कारण: वे जीवन यात्रा में सहारा देती हैं।
[1 Mark]
18.
कथन: कवि दूसरों की बातें सुनना चाहता है। कारण: वह अपनी कथा को महत्वपूर्ण नहीं मानता।
[1 Mark]
19.
“मधुप गुन-गुन कर कह जाता कौन कहानी यह अपनी” — यहाँ ‘मधुप’ क्या कर रहा है?
[1 Mark]
20.
“देखोगे — यह गागर रीती” से क्या संकेत मिलता है?
[1 Mark]
21.
“अपना को समझो” से कवि क्या कहना चाहता है?
[1 Mark]
22.
“उज्ज्वल गाथा कैसे गाऊँ” से कवि क्या व्यक्त करता है?
[1 Mark]
23.
“स्मृति पाथेय बनी है” का क्या अर्थ है?
[1 Mark]
24.
“मेरी मौन व्यथा” से क्या संकेत मिलता है?
[1 Mark]
25.
‘मधुप’ का सही अर्थ क्या है?
[1 Mark]
26.
‘अनुरागिनी उषा’ का अर्थ क्या है?
[1 Mark]
27.
‘गागर रीती’ का अर्थ है —
[1 Mark]
28.
‘पंथ’ का अर्थ है —
[1 Mark]
29.
‘कंथा’ का अर्थ है —
[1 Mark]
30.
‘स्मृति पाथेय’ का सही अर्थ है —
[1 Mark]
|